Reflections on Friendship Day
Reflections on Friendship Day
Happy Friendship Day Dear Readers!
"There is nothing on this earth more to be prized than true friendship." — Thomas Aquinas
A friend in need is a friend indeed.
सच्चा मित्र भगवान की तरह है। भगवान श्रीकृष्ण से बढकर मित्रता का निर्वाह कोई नहीं कर सकता। सुदामा उनके बचपन के मित्र थे। यद्यपि सुदामा ने एक बार श्रीकृष्ण से छिपाकर चने खाये थे पर श्री कृष्ण ने अपनी मित्रता के निर्वाह मे रंचमात्र भी कमी नहीं आने दी जब सुदामा भयंकर गरीबी मे अपने मित्र श्रीकृष्ण से मिलने आये तो मित्र की दीन दशा देखकर द्रवित हो गये और उन्होंने अपने मित्र को सब कुछ दिया। सुदामा की पत्नी द्वारा दी गई भेंट सूखे चावलों को चाव से खाया।गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।
तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।
इसलिए अपने मित्र की सहायता करें। अगर न हो सके तो जो आपसे हो सके सहायता अवश्य करें। किसी भी स्थिति मे जिससे एक बार मित्रता की है तो उसका अपमान तो किसी भी स्थिति मे न करें वरना परिणाम बहुत खराब हो सकते हैं। जैसे द्रोणाचार्य अपने मित्र पांचाल नरेश द्रुपद के पास सहायता के लिए गये तो द्रुपद ने उनका अपमान किया।महर्षि भारद्वाज के आश्रम में शिक्षा के दौरान द्रोणाचार्य और द्रुपद अच्छे मित्र थे।राजकुमार द्रुपद ने द्रोण को स्नेहवश वचन दिया था कि राजा बनने के बाद वे अपने आधे राज्य का स्वामी द्रोण को बनाएंगे। एक दिन द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने दूध पीने की इच्छा जताई, लेकिन घर में गाय न होने के कारण द्रोण बहुत दुखी हुए। वे बचपन के स्नेह को याद कर पांचाल की राजधानी पहुँचे और द्रुपद को अपनी मित्रता की दुहाई दी। राजा द्रुपद अपने पद और धन के घमंड में अंधे हो चुके थे। उन्होंने द्रोणाचार्य को पहचानने से इंकार कर दिया और अपमानित करते हुए कहा— "कहां राजा और कहां एक निर्धन ब्राह्मण! मित्रता केवल बराबर वालों में होती है।" इस अपमान से आहत होकर द्रोणाचार्य ने मन में प्रतिशोध की गांठ बांध ली और वे हस्तिनापुर आ गए। हस्तिनापुर में उन्होंने कौरव और पांडवों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी। शिक्षा पूरी होने पर गुरु दक्षिणा के रूप में अर्जुन ने पांचाल नरेश द्रुपद को युद्ध में हराकर और बंदी बनाकर अर्जुन ने द्रुपद को द्रोणाचार्य के चरणों में डाल दिया। द्रोणाचार्य ने द्रुपद से उसका आधा राज्य लेकर छोड़ा और कहा कि अब वे राजा हैं और द्रोण भी आधा राज्य लेकर उनके बराबर हो गए हैं, अतः अब उनके बीच सच्ची मित्रता हो सकती है। इस पराजय और अपमान का बदला लेने के लिए द्रुपद ने एक महायज्ञ किया, जिससे धृष्टद्युम्न और द्रौपदी का जन्म हुआ। महाभारत युद्ध के 15वें दिन द्रोणाचार्य ने राजा द्रुपद का वध किया, जिसके प्रतिशोध में धृष्टद्युम्न ने युद्ध के दौरान ही द्रोणाचार्य का वध कर दिया। युद्ध के 15वें दिन जब यह अफवाह फैलाई गई कि द्रोणाचार्य के पुत्र 'अश्वत्थामा' की मृत्यु हो गई है, तब उन्होंने शोक में अपने शस्त्र त्याग दिए और वे ध्यान में बैठ गए। उसी निहत्थे और असहाय अवस्था में धृष्टद्युम्न ने उनका सिर काट दिया। इस पर द्रोणाचार्य के पुत्र अश्त्थामा ने अपने पिता की हत्या का बदला लिया। महाभारत के सौप्तिक पर्व के अनुसार, युद्ध के अंतिम दिन की रात को अश्वत्थामा ने कृपाचार्य और कृतवर्मा के साथ मिलकर पांडवों के शिविर पर अचानक छुपकर हमला किया।अश्वत्थामा ने सोते हुए शिविर में प्रवेश किया और धृष्टद्युम्न को उसकी छाती पर पैर रखकर, बिना अस्त्र के, पीट-पीटकर और गला घोंटकर बहुत दर्दनाक मौत दी। इस प्रकार आपने देखा कि मित्र का अपमान प्रतिशोध मे बदल कर प्रतिशोध की श्रंखला मे बदल गया। भगवान श्रीराम एक आदर्श मित्र हैं। अपने मित्रों के कष्टों का निवारण किया और और उन्हें सब कुछ दिया। भगवान जब शबरी के आश्रम मे जाते है तो भगवान श्रीराम द्वारा माता सीता की सुधि पूछे जाने पर, शबरी जी कहती हैं कि आप पंपा सरोवर जाइए, जहाँ सुग्रीव से आपकी मित्रता होगी।

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